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Social media and politics: सावधान! क्या मोबाइल स्क्रीन पर तय हो रही है आपकी राजनीतिक सोच?

Social media and politics- आज आपके हाथ में मोबाइल है, लेकिन उस मोबाइल के भीतर चल रही राजनीति के तार कहीं और से जुड़े हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि किसी मुद्दे पर हमारी जो राय है, वह हमारी अपनी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपको वही खबरें, वही वीडियो और वही विज्ञापन बार-बार क्यों दिखते हैं जो आपकी विचारधारा से मेल खाते हैं?

सच्चाई यह है कि आज के दौर में आपकी राय ‘बनती’ नहीं, बल्कि ‘मैन्युफैक्चर’ की जाती है। चलिए, इस डिजिटल मायाजाल की परतों को कुछ ठोस उदाहरणों और आंकड़ों से खोलते हैं।

ट्रेंड्स का खेल: क्या ये जनता की आवाज़ है?

जब आप देखते हैं कि ट्विटर (X) पर कोई हैशटैग नंबर-1 पर है, तो हमें लगता है कि पूरा देश इस बारे में बात कर रहा है। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा ‘झोल’ है।

  • असली उदाहरण: चुनावों के दौरान कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जहाँ एक ही मिनट के भीतर हज़ारों ट्वीट एक ही ‘स्पेलिंग मिस्टेक’ के साथ किए गए। इसे ‘टूलकिट’ का कमाल कहते हैं। एक दफ्तर में बैठकर कुछ लोग तय करते हैं कि आज क्या ट्रेंड कराना है और हज़ारों ‘फेक अकाउंट्स’ (बॉट्स) उस काम में लग जाते हैं।

  • आंकड़ा: एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में होने वाले राजनीतिक ट्वीट्स में से लगभग 30% से 35% ट्वीट असली इंसान नहीं, बल्कि कंप्यूटर प्रोग्राम (बॉट्स) करते हैं। यानी जिस ट्रेंड को आप जनमत समझ रहे हैं, वह दरअसल एक सॉफ्टवेयर का शोर मात्र है।

‘डीपफेक’ और तकनीक का नया हथियार

अब वो दौर आ गया है जहाँ अपनी आँखों पर भी भरोसा करना मुश्किल है।

  • उदाहरण: हाल ही में दो बड़े बॉलीवुड स्टार्स के वीडियो वायरल हुए जिसमें वे एक खास पार्टी का प्रचार कर रहे थे। हकीकत में वे वीडियो AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से बनाए गए थे। आवाज़ और चेहरा बिल्कुल असली था। एक आम आदमी जो गांव या छोटे शहर में बैठा है, वह इसे सच मानकर अपना वोट बदल सकता है।

  • असर: यह तकनीक लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि यह चुनाव से ठीक 24 घंटे पहले किसी भी नेता की गलत इमेज बना सकती है।

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व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और ‘साइकोलॉजिकल वॉर’

भारत में व्हाट्सएप के 50 करोड़ से ज्यादा यूज़र्स हैं। राजनीतिक दलों ने अब हर पन्ने (वोटर लिस्ट का पन्ना) के लिए एक ‘डिजिटल पन्ना प्रमुख’ तैनात किया है।

  • खेल समझिए: इन ग्रुप्स में ऐसी खबरें डाली जाती हैं जो सीधे आपके डर या गौरव (Pride) को छूती हैं। अगर आप धर्म को लेकर भावुक हैं, तो आपको दिन भर ऐसे ही मैसेज दिखेंगे।

  • डेटा का डाका: दुनिया भर में चर्चित ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ कांड ने साबित किया था कि कैसे फेसबुक डेटा के ज़रिए लोगों की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई गई और फिर उन्हें उनके ‘डर’ के हिसाब से विज्ञापन दिखाकर उनके वोट को प्रभावित किया गया।

सोशल मीडिया (Social Media): लोकतंत्र का दोस्त या दुश्मन?

जब यह मजबूती देता है:

जब 2021 में किसानों का आंदोलन हुआ, तो मुख्यधारा के मीडिया ने उसे उतनी जगह नहीं दी। लेकिन सोशल मीडिया पर आम लोगों और छोटे यूट्यूबर्स के वीडियो ने इतना दबाव बनाया कि सरकारों को झुकना पड़ा। यह इसकी असली ताकत है।

जब यह कमजोरी बनता है:

एक रिपोर्ट (Microsoft Digital Civility Index) के मुताबिक, भारत में फेक न्यूज़ की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। एक गलत मैसेज की वजह से मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं हो जाती हैं। यहाँ सोशल मीडिया लोकतंत्र का दुश्मन बन जाता है।

ठोस आंकड़े जो आपको चौंका देंगे

  • करोड़ों का खर्च: भारत में बड़े राजनीतिक दल अपने कुल प्रचार बजट का लगभग 25% से 30% हिस्सा सिर्फ डिजिटल विज्ञापनों और सोशल मीडिया मैनेज करने वाली कंपनियों को देते हैं।

  • अटेंशन स्पैन: एक औसत यूज़र किसी खबर को सिर्फ 3 से 5 सेकंड देखता है। इन्हीं चंद सेकंड्स में आपकी राय बदलने के लिए ‘हेडलाइन’ को इतना भड़काऊ बनाया जाता है कि आप बिना सोचे-समझे उसे शेयर कर दें।

विशेष: ‘खबर समझो’ फैक्ट-चेक टूलकिट (खुद बनें अपनी खबरों के जज)

  1. गूगल रिवर्स इमेज सर्च: किसी भी संदेहास्पद फोटो को गूगल इमेज सर्च में डालें। अक्सर पता चलता है कि फोटो पुरानी है या किसी दूसरे देश की।

  2. ‘Forwarded Many Times’ का निशान: व्हाट्सएप पर इस निशान वाले मैसेज को तब तक सच न मानें जब तक आप उसे किसी भरोसेमंद न्यूज़ वेबसाइट पर न देख लें।

  3. सरकारी फैक्ट-चेक: आप सीधे PIB Fact Check (+91 8799711259) के व्हाट्सएप नंबर पर मैसेज भेजकर सच्चाई जान सकते हैं।

FAQ: आपके मन के सवाल और उनके जवाब

सवाल 1: क्या मेरी निजी चैट भी राजनीतिक दल पढ़ सकते हैं?

जवाब: आपकी व्हाट्सएप चैट सुरक्षित है, लेकिन आप फेसबुक पर क्या लाइक करते हैं और गूगल पर क्या सर्च करते हैं, इससे आपकी पसंद-नापसंद का डेटा उन तक पहुँच जाता है। इसी को ‘डेटा माइनिंग’ कहते हैं।

सवाल 2: ‘टूलकिट’ असल में होती क्या है?

जवाब: टूलकिट एक ‘गाइड’ होती है जिसमें लिखा होता है कि आज क्या हैशटैग चलाना है और किन शब्दों का इस्तेमाल करना है। इसे आईटी सेल अपने कार्यकर्ताओं को व्हाट्सएप के जरिए भेजते हैं।

सवाल 3: क्या सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स भी पैसे लेकर राय बदलते हैं?

जवाब: जी हाँ, अब नेता रैलियों से ज्यादा उन यूट्यूबर्स और इंस्टाग्राम स्टार्स पर ध्यान दे रहे हैं जिनके लाखों फॉलोअर्स हैं। वे बड़ी चतुराई से वीडियो के बीच में राजनीतिक संदेश घुसा देते हैं।

सवाल 4: अगर कोई फेक न्यूज़ फैला रहा है, तो क्या करें?

जवाब: आप उस प्लेटफॉर्म पर ‘Report’ कर सकते हैं। साथ ही उस खबर को आगे फॉरवर्ड न करके आप उस ‘झूठ’ की चेन को तोड़ सकते हैं।

सवाल 5: सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल कैसे करें?

जवाब: अपने फीड में सिर्फ अपनी पसंद के ही नहीं, बल्कि विरोधी विचारधारा के लोगों को भी फॉलो करें। जब आप दोनों पक्ष देखेंगे, तभी आपकी राय ‘बनेगी’, न कि ‘बनाई जाएगी’ |

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