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No Confidence Motion- 70 साल में कभी नहीं हुआ ऐसा! क्या विपक्ष हटा पाएगा स्पीकर ओम बिरला को? जानें अविश्वास प्रस्ताव की पूरी प्रक्रिया

No Confidence Motion- लोकसभा में इस समय जबरदस्त सियासी गहमागहमी बनी हुई है। विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लाने की तैयारी  है। इसके लिए विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर जुटाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। विपक्ष का मुख्य आरोप यह है कि स्पीकर सदन की कार्यवाही के दौरान ‘पक्षपाती’ रवैया अपना रहे हैं और विपक्ष के नेताओं को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दे रहे हैं। अभी हाल में लोकसभा में leader of Opposition राहुल गांधी को नही बोलने दिए जाने को लेकर काफी हंगामा भी हुआ था .

यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा स्पीकर का पद भारतीय लोकतंत्र में बहुत ऊंचा और ‘निष्पक्ष’ माना जाता है। अगर उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) आता है, तो यह सदन की गरिमा और सत्ता-विपक्ष के रिश्तों के लिहाज से एक बड़ी घटना होती है। आज हम आसान भाषा में समझेंगे कि आखिर यह अविश्वास प्रस्ताव क्या होता है, स्पीकर को पद से हटाने का कानून क्या है और क्या भारत के इतिहास में कभी किसी स्पीकर को इस तरह हटाया गया है?

आखिर क्यों नाराज है विपक्ष?

अमूमन सदन में बहस और हंगामे होते रहते हैं, लेकिन जब मामला स्पीकर तक पहुँचता है, तो स्थिति गंभीर हो जाती है। विपक्ष का कहना है कि उनकी आवाज़ दबाई जा रही है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के बजाय सदस्यों को निलंबित (Suspend) किया जा रहा है या उनके माइक बंद कर दिए जा रहे हैं। इन्हीं शिकायतों को लेकर अब विपक्षी दलों ने एकजुट होकर ओम बिरला को पद से हटाने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। ताजा मामला राहुल गांधी को लेकर है जहां विपक्षी पार्टी का आरोप है लोकसभा में Leader of Opposition राहुल गांधी को नही बोलने दिए जाने का मामला काफी गर्माया था

इसका मतलब आसान भाषा में समझिए

इसे ऐसे समझिए जैसे एक क्रिकेट मैच चल रहा हो। मैच का अंपायर (स्पीकर) निष्पक्ष होना चाहिए। लेकिन अगर एक टीम को लगे कि अंपायर बार-बार दूसरी टीम की मदद कर रहा है और उनके जायज अपीलों को खारिज कर रहा है, तो वह टीम उस अंपायर को बदलने की मांग करती है।

लोकसभा में भी स्पीकर ‘अंपायर’ की भूमिका में होते हैं। अविश्वास प्रस्ताव वह कानूनी तरीका है जिसके जरिए सदन के सदस्य यह तय करते हैं कि उन्हें अब मौजूदा ‘अंपायर’ पर भरोसा नहीं रहा और उन्हें हटाया जाना चाहिए।

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स्पीकर को हटाने की कानूनी प्रक्रिया (Step-by-Step)

संविधान के अनुच्छेद 94 में लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया दी गई है। यह कोई साधारण काम नहीं है, इसके लिए खास नियमों का पालन करना होता है:

  1. 14 दिन का नोटिस: सबसे पहले स्पीकर को कम से कम 14 दिन पहले एक लिखित नोटिस देना पड़ता है कि उनके खिलाफ प्रस्ताव लाया जा रहा है।

  2. 50 सांसदों का समर्थन: इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए सदन के कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन होना अनिवार्य है।

  3. चर्चा और वोटिंग: इसके बाद सदन में इस पर चर्चा होती है। ध्यान रहे, जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तब वह खुद सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते।

  4. प्रभावी बहुमत (Effective Majority): स्पीकर को हटाने के लिए ‘प्रभावी बहुमत’ की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि सदन के कुल सदस्यों (खाली सीटों को हटाकर) में से आधे से अधिक सदस्यों का वोट उनके खिलाफ होना चाहिए।

इतिहास: अब तक कितनी बार आया प्रस्ताव?

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अब तक कई बार स्पीकरों के खिलाफ अविश्वास के स्वर उठे हैं, लेकिन किसी को भी इस प्रक्रिया से हटाया नहीं जा सका है:

  • जी.वी. मावलंकर (1954): भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ भी विपक्ष ने प्रस्ताव लाया था, लेकिन वह गिर गया।

  • सरदार हुकम सिंह और के.एस. हेगड़े: इनके कार्यकाल में भी विपक्षी दलों ने नाराजगी जताई थी।

  • सोमनाथ चटर्जी (2008): परमाणु डील के समय जब उनकी पार्टी (सीपीएम) ने उनसे इस्तीफा देने को कहा और उन्होंने मना कर दिया, तब भी काफी विवाद हुआ था।

अभी तक का रिकॉर्ड रहा है कि सत्ता पक्ष के पास बहुमत होने के कारण ये प्रस्ताव कभी पास नहीं हो पाए।

आम आदमी पर इसका क्या असर होगा?

शायद आप सोचें कि इससे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा? दरअसल, इसका असर बहुत गहरा है:

  • संसद की कार्यवाही: जब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है, तो संसद का कामकाज ठप हो जाता है। जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये चर्चा के बिना बर्बाद होते हैं।

  • लोकतंत्र की सेहत: अगर निष्पक्ष संस्थाओं पर सवाल उठते हैं, तो आम आदमी का सिस्टम से भरोसा कम होने लगता है।

FAQ Section: आपके मन में उठने वाले सवाल

1. क्या अविश्वास प्रस्ताव आने पर स्पीकर को तुरंत इस्तीफा देना पड़ता है?

नहीं, प्रस्ताव पास होने तक वे अपने पद पर बने रहते हैं। हालांकि, वोटिंग के समय वे अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठ सकते।

2. अगर प्रस्ताव पास हो जाए तो क्या होगा?

अगर बहुमत उनके खिलाफ वोट कर देता है, तो स्पीकर को तुरंत अपना पद छोड़ना होगा और नए स्पीकर का चुनाव होगा।

3. क्या स्पीकर खुद वोट दे सकते हैं?

अमूमन स्पीकर तभी वोट देते हैं जब मामला बराबर (Tie) हो जाए। लेकिन जब उनके खुद के खिलाफ प्रस्ताव हो, तो वे एक सामान्य सदस्य की तरह वोट दे सकते हैं।

4. क्या यह प्रस्ताव राज्यसभा में भी जाता है?

नहीं, लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का अधिकार सिर्फ लोकसभा के पास होता है।

5. लोकसभा स्पीकर को चुनता कौन है?

सदन के सभी निर्वाचित सांसद मिलकर अपने बीच में से ही किसी एक को बहुमत के आधार पर स्पीकर चुनते हैं।

इस खबर से क्या समझें?

अविश्वास प्रस्ताव लाना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसे पास कराना मौजूदा गणित के हिसाब से बहुत मुश्किल है। ओम बिरला के पास सत्ता पक्ष का पूर्ण बहुमत है। विपक्ष का यह कदम असल में स्पीकर को पद से हटाने से ज्यादा, सरकार पर दबाव बनाने और जनता के बीच अपनी बात पहुँचाने की एक ‘राजनीतिक रणनीति’ है।

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