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RSS Chief Mohan Bhagwat on Caste and Merit: ‘ब्राह्मण होना योग्यता नहीं’, संघ प्रमुख

RSS Chief Mohan Bhagwat on Caste and Merit: ‘ब्राह्मण होना योग्यता नहीं’, संघ प्रमुख के इस बयान के क्या हैं मायने? —— मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक ऐसी बात कही है, जिसने देश की सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया है। भागवत ने साफ शब्दों में कहा कि “किसी विशेष जाति (ब्राह्मण) में जन्म लेना कोई योग्यता या काबिलियत का पैमाना नहीं है।” उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि संघ का अगला प्रमुख (सरसंघचालक) किसी भी जाति का व्यक्ति बन सकता है, बशर्ते उसमें उतनी क्षमता और समर्पण हो।

यह बयान इसलिए खास है क्योंकि दशकों से संघ पर यह आरोप लगता रहा है कि इसके शीर्ष नेतृत्व पर केवल एक खास वर्ग का कब्जा है।  इस बयान के जरिए भागवत ने न केवल अपने आलोचकों को जवाब दिया है, बल्कि संघ के भीतर भविष्य में होने वाले बड़े बदलावों का संकेत भी दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू समाज की एकता के लिए जातिगत ऊंच-नीच को जड़ से मिटाना होगा।

इस बयान की टाइमिंग क्यों अहम है?

आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी। तब से लेकर आज तक, 100 साल के इतिहास में केवल एक बार (रज्जू भैया) ऐसा हुआ है जब कोई गैर-ब्राह्मण व्यक्ति संघ प्रमुख बना हो। इसी पृष्ठभूमि के कारण संघ को अक्सर ‘परंपरावादी’ माना जाता रहा है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मोहन भागवत अपनी छवि को बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। वे कभी मस्जिदों में जाते हैं, तो कभी पिछड़ों के उत्थान की बात करते हैं। अब “योग्यता बनाम जाति” की यह नई बहस छेड़कर उन्होंने यह संदेश दिया है कि संघ अपने 100वें वर्ष के बाद एक नई, आधुनिक और समावेशी (सबको साथ लेकर चलने वाली) राह पर चलने के लिए तैयार है।

आरएसएस और जातिवाद (RSS and Casteism)

अगर हम इस खबर की परतें खोलें, तो भागवत के शब्दों के पीछे तीन बड़े मतलब छिपे हैं:

  1. मेरिट (Merit) ही असली पहचान: इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप संघ के स्वयंसेवक हैं, तो आपकी तरक्की इस बात से नहीं होगी कि आपके नाम के आगे क्या सरनेम लगा है। आपकी मेहनत और संगठन के प्रति आपकी वफादारी ही आपको शीर्ष तक ले जाएगी।

  2. पुराने मिथकों को तोड़ना: भागवत यह मान रहे हैं कि समाज में यह धारणा बन गई थी कि कुछ पद केवल ‘खास’ लोगों के लिए हैं। इस बयान से उन्होंने उस धारणा को सरकारी तौर पर खारिज कर दिया है।

  3. हिंदू समाज का एकीकरण: भागवत जानते हैं कि अगर हिंदू समाज जातियों में बंटा रहा, तो संघ का ‘अखंड भारत’ या ‘हिंदू राष्ट्र’ का सपना अधूरा रह जाएगा। इसलिए वे जाति की दीवार को गिराकर सबको एक ही पायदान पर खड़ा करना चाहते हैं।

आम आदमी पर असर+सामाजिक समरसता( Social Harmony)

एक आम नागरिक के तौर पर, चाहे आप संघ से जुड़े हों या नहीं, इस खबर का असर आपके जीवन पर भी पड़ता है:
  • मानसिकता में बदलाव: जब समाज का एक बड़ा वर्ग जिसे आदर्श मानता है, वह अगर जातिवाद के खिलाफ बोले, तो ज़मीनी स्तर पर भेदभाव कम होता है।

  • अवसर की समानता: यह बयान एक उम्मीद जगाता है कि आने वाले समय में केवल आरएसएस ही नहीं, बल्कि देश के अन्य बड़े संस्थानों में भी ‘जाति’ के बजाय ‘योग्यता’ को तरजीह दी जाएगी।

  • सामाजिक तनाव में कमी: जातिगत श्रेष्ठता के दावों से अक्सर समाज में टकराव होता है। जब शीर्ष स्तर से ऐसी बातें आती हैं, तो सामाजिक समरसता (Social Harmony) बढ़ती है।

FAQ Section: आपके सवाल, हमारे जवाब

1. क्या मोहन भागवत खुद ब्राह्मण हैं?

जी हाँ, मोहन भागवत स्वयं ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। यही कारण है कि जब वे खुद अपनी जाति को “योग्यता का पैमाना नहीं” बताते हैं, तो इस बात का वजन और बढ़ जाता है।

2. क्या संघ प्रमुख का चुनाव वोटिंग से होता है?

नहीं, आरएसएस में सरसंघचालक का चुनाव वोटिंग से नहीं होता। वर्तमान प्रमुख ही अपने उत्तराधिकारी (Successor) का चुनाव करते हैं। भागवत के इस बयान के बाद अब अगले प्रमुख के चयन पर पूरी दुनिया की नज़र रहेगी।

3. क्या यह बयान केवल ब्राह्मणों के लिए है?

नहीं, यह बयान पूरे हिंदू समाज के लिए है। यह एक उदाहरण है कि किसी भी जाति का व्यक्ति अगर काबिल है, तो उसे ऊपर आने से कोई नहीं रोक सकता।

4. इस बयान से राजनीति में क्या बदलेगा?

इससे बीजेपी को उन जातियों का समर्थन हासिल करने में आसानी होगी जो अब तक संघ और बीजेपी को केवल ‘ऊपरी जातियों’ की पार्टी मानती थीं।

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इस ख़बर से क्या समझे ?

इस पूरी खबर का सार यह है कि आरएसएस अब खुद को बदलने की प्रक्रिया में है। मोहन भागवत का यह बयान सिर्फ एक स्पीच नहीं है, बल्कि एक विजन डॉक्यूमेंट है। वे साफ कह रहे हैं कि “जन्म” से बड़ा “कर्म” होता है।

एक आम आदमी के लिए यह खबर एक सकारात्मक संदेश है कि अब योग्यता की लड़ाई में आपकी जाति आपके आड़े नहीं आएगी। यह भारतीय समाज के लिए एक परिपक्व (Mature) कदम है, जहाँ अब बहस इस बात पर होगी कि कौन कितना काबिल है, न कि इस पर कि कौन किस घर में पैदा हुआ है

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