Prajapati Colony Delhi Potters Village-मिट्टी की खुशबू में बसती एक दुनिया: दिल्ली की प्रजापति कॉलोनी, जहाँ चाक पर घूमती है सदियों पुरानी सभ्यता
"कंक्रीट के जंगल के बीच जीवित परंपरा! जानिए कैसे राजस्थान से आए परिवारों ने उत्तम नगर में बसाई प्रजापति कॉलोनी और कैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही है यह कला।"
Prajapati Colony Delhi Potters Village– दिल्ली को अक्सर एक तेज़ रफ़्तार महानगर कहा जाता है, जहाँ समय कभी रुकता नहीं और कंक्रीट के जंगलों के बीच आधुनिकता की दौड़ हमेशा जारी रहती है। लेकिन इसी व्यस्त शहर के पश्चिमी हिस्से में, उत्तम नगर के बिंदापुर मार्ग की ओर कदम बढ़ाते ही एक बिल्कुल अलग दुनिया आपका स्वागत करती है। यहाँ की हवा में गाड़ियों का धुआँ नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी खुशबू घुली हुई है। यह है प्रजापति कॉलोनी, जिसे लोग ‘कुम्हार ग्राम’ के नाम से भी पहचानते हैं।
एशिया की सबसे बड़ी कुम्हार बस्तियों में से एक मानी जाने वाली इस कॉलोनी में लगभग एक हजार से अधिक परिवार रहते हैं, जो पीढ़ियों से टेराकोटा कला और मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। सुबह की पहली किरण के साथ ही यहाँ की संकरी गलियों में चाक की गड़गड़ाहट और भट्ठियों की गर्माहट महसूस की जा सकती है। यह बस्ती केवल बर्तन नहीं बनाती, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत को आकार देती है।
राजस्थान से दिल्ली तक का सफर: कुम्हार ग्राम की स्थापना
प्रजापति कॉलोनी का इतिहास लगभग पाँच दशक पुराना है। 1960 के दशक में राजस्थान के विभिन्न जिलों—खासकर अलवर, करौली और आसपास के क्षेत्रों से कुम्हार परिवार आजीविका की तलाश में दिल्ली आए थे। उन्होंने यहाँ अपनी कला को एक नया ठिकाना दिया और देखते ही देखते यह इलाका मिट्टी के शिल्पकारों का गढ़ बन गया।
संघर्ष और समर्पण की कहानियाँ
इसी बस्ती में रहने वाले 72 वर्षीय बाबू लाल प्रजापति की कहानी इस कॉलोनी के सफर को दर्शाती है। अलवर जिले के कठूमर गाँव के मूल निवासी बाबू लाल अपने गाँव के पहले मैट्रिक पास व्यक्ति थे। 1970 के दशक में जब गाँव के लोग उनसे चिट्ठियाँ पढ़वाने आते थे, तब भी उनका परिवार मिट्टी के काम से जुड़ा हुआ था।
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बदलता समय और चुनौतियाँ: बाबू लाल बताते हैं कि आज की पीढ़ी के सामने चुनौतियाँ अलग हैं। उनका बड़ा बेटा अब ऑनलाइन माध्यमों से मिट्टी के उत्पादों को बेचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बाज़ार में प्लास्टिक के सामान और मशीनी उत्पादों की वजह से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
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नई राहें: वहीं, उनका छोटा बेटा आर्ट एंड क्राफ्ट शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा है, जो दिखाता है कि परंपरा और आधुनिक शिक्षा का संगम किस तरह हो रहा है।
पुलिस की सरकारी नौकरी छोड़ मिट्टी को चुना: राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गिरिराज प्रसाद
प्रजापति कॉलोनी को देश-विदेश में नई पहचान दिलाने का श्रेय कई वरिष्ठ कलाकारों को जाता है, जिनमें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गिरिराज प्रसाद का नाम प्रमुख है। 18 दिसंबर 1965 को करौली (राजस्थान) के एक पारंपरिक टेराकोटा परिवार में जन्मे गिरिराज प्रसाद का बचपन मिट्टी और चाक के बीच ही बीता।
[ पारंपरिक टेराकोटा परिवार में जन्म (1965) ]
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[ दिल्ली पुलिस में स्थायी सरकारी नौकरी ]
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[ 1988-89: नौकरी छोड़कर पुश्तैनी कला में वापसी ]
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[ राष्ट्रीय एवं राज्य पुरस्कारों से सम्मान, G20 समिट में कला प्रदर्शन ]
एक कठिन फैसला जिसने इतिहास बदला
वर्ष 1988-89 में गिरिराज प्रसाद ने दिल्ली पुलिस की अपनी स्थायी सरकारी नौकरी छोड़ दी। उस दौर में सरकारी नौकरी को भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा माना जाता था, इसलिए उनका यह कदम कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। लेकिन उन्होंने अपनी पुश्तैनी कला और मिट्टी से जुड़े जुड़ाव को प्राथमिकता दी।
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वैश्विक पटल पर पहचान: उन्होंने सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला, दिल्ली हाट, और नेशनल हैंडीक्राफ्ट्स म्यूज़ियम जैसे मंचों पर अपनी कला का लोहा मनवाया।
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G20 समिट का ऐतिहासिक क्षण: वर्ष 2023 में दिल्ली में आयोजित G20 समिट के दौरान बने ‘क्राफ्ट्स बाज़ार’ में उन्होंने अपनी टेराकोटा कला का प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री के समक्ष चाक पर मिट्टी को आकार देने का उनका चित्र आज भी इस पूरी कॉलोनी के लिए गर्व का प्रतीक है।
“मिट्टी केवल बर्तन नहीं, मानव सभ्यता का प्रतीक है”
टेराकोटा कला दुनिया की प्राचीनतम विधाओं में से एक है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले मिट्टी के बर्तन इस बात का प्रमाण हैं कि चाक का आविष्कार मानव विकास के शुरुआती चरणों में हुआ था। प्रजापति कॉलोनी में आज भी उसी पारंपरिक और प्राकृतिक प्रक्रिया से उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
मिट्टी से उत्पाद बनने की प्रक्रिया
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मिट्टी की तैयारी: राजस्थान और अन्य राज्यों से मिट्टी मंगवाई जाती है, जिसे छानकर और गूँथकर बारीक बनाया जाता है।
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चाक पर ढलाई: कुशल हाथों से मिट्टी को सुराही, दीये, हांडी, कुल्हड़ या सजावटी मूर्तियों का आकार दिया जाता है।
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सुखाना और पकाना: तैयार कच्चे सामान को धूप में सुखाया जाता है और फिर पारंपरिक भट्ठियों में निश्चित तापमान पर पकाया जाता है।
गिरिराज प्रसाद कहते हैं, “दुनिया भर से लोग हमारे पास तरह-तरह के डिज़ाइन लेकर आते हैं और पूछते हैं कि क्या यह मिट्टी से बन सकता है? हमारा जवाब हमेशा ‘हाँ’ होता है, क्योंकि कुम्हार के हाथ मिट्टी से कुछ भी रच सकते हैं।”
विदेशों तक पहुँचती भारतीय टेराकोटा कला
प्रजापति कॉलोनी केवल स्थानीय बाज़ार तक सीमित नहीं है। यहाँ तैयार किए गए हस्तशिल्प और टेराकोटा सजावटी सामानों की माँग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है।
जनकपुरी और आसपास की कई एक्सपोर्ट कंपनियाँ और व्यापारी यहाँ के कारीगरों से सीधे उत्पाद खरीदते हैं। हाथ से बने इन उत्पादों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इनमें मशीनों जैसी एकरूपता (Machine Uniformity) नहीं, बल्कि कलाकार के हाथों की कलात्मक भिन्नता और अनूठापन होता है, जिसे विदेशी खरीदार बेहद पसंद करते हैं।
सरकारी योजनाएँ और जमीनी धरातल की चुनौतियाँ
हस्तशिल्प और कुम्हार कला को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम विश्वकर्मा योजना जैसी पहल शुरू की है। इस योजना में शामिल 18 पारंपरिक शिल्पों में कुम्हार (Potters) का ट्रेड भी शामिल है। इसके तहत ट्रेनिंग, टूलकिट्स और वित्तीय सहायता का प्रावधान है।
योजनाएँ और जमीनी हकीकत
| क्षेत्र | मौजूदा स्थिति | सुधार के लिए आवश्यक कदम |
| जागरूकता (Awareness) | कई कारीगरों को आवेदन प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। | स्थानीय स्तर पर नियमित जानकारी शिविर लगाना। |
| कच्चा माल (Raw Material) | दिल्ली में अच्छी मिट्टी की अनुपलब्धता से लागत अधिक। | रियायती दरों पर मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करना। |
| बाज़ार पहुँच (Market Access) | मध्यस्थों (Middlemen) पर अधिक निर्भरता। | डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़ना। |
कारीगरों का मानना है कि यदि आधुनिक डिजिटल मार्केटिंग और direct-to-consumer (D2C) मॉडल को कुम्हार ग्राम के साथ जोड़ा जाए, तो युवा पीढ़ी इस पेशे को आगे बढ़ाने में अधिक रुचि दिखाएगी।
चुनौतियाँ और पर्यावरण अनुकूल (Eco-Friendly) भविष्य
आज जब प्लास्टिक और सिंथेटिक उत्पादों से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँच रहा है, तब मिट्टी के बर्तनों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। चाय के लिए मिट्टी के कुल्हड़, खाना पकाने के लिए मिट्टी की हांडी और उत्सवों के लिए दीयों की माँग फिर से बढ़ रही है।
दीपावली और त्योहारों के सीज़न में प्रजापति कॉलोनी का नज़ारा देखने लायक होता है। घर का हर सदस्य—बुज़ुर्गों के अनुभव से लेकर बच्चों के उत्साह तक—दीये बनाने और उन्हें रंगने में जुट जाता है। यह कॉलोनी इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि विकास की अंधी दौड़ के बीच भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कैसे सहेजा जा सकता है।
उत्तम नगर की प्रजापति कॉलोनी केवल एक रिहायशी इलाका नहीं है, बल्कि यह दिल्ली का एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ का हर घर एक कार्यशाला है और हर हाथ एक कहानी बुनता है। प्लास्टिक और मशीनी दौर की तमाम चुनौतियों के बावजूद, यहाँ के कारीगर अपनी लगन और मेहनत से मिट्टी में जान फूँक रहे हैं।
जैसे-जैसे दुनिया प्राकृतिक और टिकाऊ (Sustainable) जीवनशैली की ओर वापस लौट रही है, मिट्टी के उत्पादों का महत्व और बढ़ता जा रहा है। प्रजापति कॉलोनी की मिट्टी की सोंधी महक हमें याद दिलाती है कि हमारी सभ्यता और कला की शुरुआत मिट्टी से ही हुई थी और इसकी सुंदरता को बचाए रखना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. दिल्ली में प्रजापति कॉलोनी या कुम्हार ग्राम कहाँ स्थित है?
प्रजापति कॉलोनी दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में उत्तम नगर के पास बिंदापुर रोड पर स्थित है। इसे एशिया की सबसे बड़ी कुम्हार बस्तियों में से एक माना जाता है।
2. प्रजापति कॉलोनी के कारीगर मुख्य रूप से कहाँ से आकर बसे हैं?
1960 के दशक से राजस्थान के विभिन्न जिलों, विशेषकर करौली और अलवर से कुम्हार परिवार रोजगार और अपनी कला को विस्तार देने के लिए यहाँ आकर बसे।
3. टेराकोटा कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए कौन सी प्रमुख सरकारी योजना चल रही है?
केंद्र सरकार की पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत कुम्हारों को प्रशिक्षण, आधुनिक औजार, आर्थिक सहायता और बाज़ार से जोड़ने का प्रावधान किया गया है।
4. क्या प्रजापति कॉलोनी के मिट्टी के उत्पाद विदेशों में भी भेजे जाते हैं?
हाँ, यहाँ के कारीगरों द्वारा बनाए गए हाथ के टेराकोटा शिल्प और सजावटी सामान भारत के विभिन्न शहरों के साथ-साथ कई एक्सपोर्टर्स के माध्यम से विदेशों में भी भेजे जाते हैं।
5. मिट्टी के उत्पादों का इस्तेमाल पर्यावरण के लिए क्यों बेहतर है?
मिट्टी के उत्पाद 100% प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल (गलने योग्य) होते हैं। यह प्लास्टिक कचरे को कम करने में मदद करते हैं और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी पूरी तरह सुरक्षित होते हैं।
Story by Lalit Kumar ” Rudra”



